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मंगलवार, जुलाई 17, 2012

हिंदी से प्रेम करें, देश का सम्मान करें

 दोस्तों ! हमें अपनी अधिक से अधिक विचार/रचना हिंदी में लिखनी चाहिए थी. आज हिंदी की इतनी बुरी स्थिति खुद उसको चाहने वालों की वजह से है. हिंदी से प्रेम करें, देश का सम्मान करें. मैंने किसी समूह से एक रचना लेकर उस रचना का अनुवाद हिंदी में किया है. जिसको कवि डॉ. विश्वास ने अनेकों बार सुनाया है. 

कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता है
मगर धरती की बैचनी को बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ,तू मुझसे दूर कैसी है
यह तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है
कि मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे आगे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे
समंदर पीर का अन्दर हैं लेकिन रो नहीं सकता
यह आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

भँवरा कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थें सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा
कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता है
मगर धरती की बैचनी को बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ,तू मुझसे दूर कैसी है
यह तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है
कि मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नहीं पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया
अधूरा अनसुना ही रह गया यूँ प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नहीं पाए,कभी मैं कह नहीं पाया
भरमार कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थें सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

मैं उसका हूँ वो इस एहसास से इनकार करता है
भरी महफ़िल में भी रुसवा हर बार करता है
यकीं है सारी दुनिया को खफा है हमसे वो लेकिन
मुझे मालूम है फिर भी मुझ ही से प्यार करता है
मैं जब भी तेज़ चलता हूँ नज़ारे छूट जाते हैं
कोई जब रूप गढ़ता हूँ तो सांचे टूट जाते हैं
मैं रोता हूँ तो आकर लोग कन्धा थप-थपाते हैं
मैं हँसता हूँ तो मुझसे लोग अक्सर रूठ जाते हैं

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे आगे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे
समंदर पीर का अन्दर हैं लेकिन रो नहीं सकता
यह आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

कोई दीवाना कहता हैं कोई पागल समझता है
मगर धरती की बैचनी को बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ,तू मुझसे दूर कैसी है
यह तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है

अनुवाद:रमेश कुमार जैन उर्फ़ सिरफिरा.

गुरुवार, मार्च 31, 2011

शायरों की महफिल से

 आज आप सभी पाठकों के लिए "जीवन का लक्ष्य" समाचार पत्र के सर्वप्रथम अंक अक्तूबर 1997 में प्रकाशित एक रचना के साथ ही पिछले दिनों मेट्रो रेल में यात्रा के दौरान "कहे" शेर प्रस्तुत है.
तुम अघोषित युध्द लड़ते हो
तुम जब-जब, अख़बार पढ़ते हो, 
एक अघोषित-सा युध्द लड़ते हो,
असत्य से सत्य के लिए, 
अन्याय से न्याय के लिए,
भ्रष्टाचार और अत्याचार के खिलाफ, 
युध्द.....महायुध्द......उनसे.......
जो संख्या में मुट्ठी भर है, 
मगर अकूत दौलत के स्वामी है,
और क्रूर, ताकतवर हैं, 
उनके दिमाग में धूर्तता है, छल है
उनके पास कानून, सत्ता का हथियार है, 
और वो हर हालत में, हमें दबाने, कुचलने,
खत्म करने को तैयार है, 
ऐसे में अपने अस्तित्व को 
कायम रखने के लिए
कुछ तो करना होगा, 
लिखें, पैने, नुकीले शब्द बाणों से, 
हमें यह युध्द लड़ना होगा, 
और.......इस महासंग्राम में,
मैं भी कलम का सिपाही बनकर, 
अपना सबकुछ न्यौछावर करने आया हूँ
"जीवन का लक्ष्य" के नाम से जलते, 
सुलगते शब्दों का हथियार
अख़बार लाया हूँ 
मेरा एक जीवन का लक्ष्य, 
असत्य का खंडन, पर्दाफाश.....
न्याय की स्थापना, सत्य का प्रचार,
रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का
पर्दाफाश करते हुए सनसनीखेज समाचार 
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है
हमें मिलता रहेगा, 
जागरूक पाठकगण का सहयोग और प्यार.  
******************************************************
वो बातों में जीत लेने की बात करते हैं.
उन्हें क्या मालूम प्यार में,
जीत, जीत नहीं होती और
हार, हार नहीं होती है. 
***********
न तुम सुनती हो, न वो सुनते हैं,
यह हमारी जिंदगी की कैसी कहानी है.
जो किसी को समझ नहीं आती है,
इसलिए कोई सुनना ही नहीं चाहता है.  

शुक्रवार, नवंबर 05, 2010

शायरों की महफिल से

अपनाने का डर सा लगता
शेरों- शायरी की महफिल में आपका स्वागत है. नाचीज़ का सलाम कबूल करें. शेरों- शायरी, ग़ज़लों, कविताओं की दुनियां में जब कोई भी, कभी भी किसी रचना को सुनता या पढ़ता है. तब कई बार लगता है कि-उपरोक्त रचना को या सिर्फ इन लाइनों को मेरे लिए कहा गया है. उस रचना में व्यक्त भावों में अपना ही दर्द महसूस होता है. पिछले दिनों ऐसी एक रचना बगैर शीर्षक वाली पढने को मिली. पढ़कर अपनी सी लगी. लेखक का नाम तो याद नहीं है, मगर रचना बहुत  अच्छी है. उसको बस एक शीर्षक देकर आपके लिए प्रस्तुत किया. रचना बुरी लगे तो आलोचना मेरी कीजिये, क्योकि यह रचना मैंने संकलन की है और अगर अच्छी लगे तो उस लेखक की तारीफ जरुर कीजियेगा.गौर फरमाईयेगा...........अर्ज किया है.
मुझे अकेले पन से डर लगता है, मुझे अंधेरों से डर लगता है !
मुझे दुश्मनों से नहीं पर अपनों से विराना होने का डर लगता है !!
कहने को सबकुछ है पर अपनों को अपना कहते डर सा लगता है !!!
जो लोग कभी अपने थे उनको अपनाने का डर सा लगता है !!!!
जिन्हें कभी रंगों से रंगता था उनको अब रंग 
लगाते डर सा लगता है !!!!!
कैसी लगी आपको यह रचना. अब थोडा-सा कष्ट और करें. मेरे द्वारा कही (निम्नलिखित) एक रचना का शीर्षक भी सुझा दें. उपरोक्त रचना दिल्ली में चलने वाली मैट्रो रेल में "कही" गई थी.

कृपया रचना का कोई अच्छा-सा "शीर्षक"(नाम) बताईये!
राह गुजर होती हैं जब भी तेरे शहर से,
प्यासी निगाहें ढूढती हैं तुझे देख लेने की आस से.
यह गुस्ताखी थी हमारी कि-उन्हें खुदा कह बैठे,
न थें ज़रें के भी काबिल उन्हें खुदा समझ बैठे.
हमने कहा होता काश अपना दर्द ज़माने से,
हमारी भी किस्मत बन गई होती आपकी कहानी से.
हम तुम्हारी क्रूरता सहन करते रहें प्यार समझ के,

तुम प्यार का ढ़ोंग करते रहें तिजोरी समझ के.  
नोट : कोई भी रचना "लिखी" नहीं जाती है बल्कि "कही" जाती है. जैसे मैंने उपरोक्त रचना लिखी नहीं कही है. हमेशा अनजान व्यक्तियों द्वारा कहा जाता है कि-मैंने यह कविता, ग़ज़ल या शेरों-शायरी लिखी है.
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क्रान्ति का बिगुल बजाये

जनकल्याण हेतु अपनी आहुति जरुर दें
हर वो भारतवासी जो भी भ्रष्टाचार से दुखी है,वो देश की आन-बान-शान के लिए अब भी समाजसेवी श्री अन्ना हजारे का समर्थन करने हेतु एक बार 022-61550789पर स्वंय भी मिस्ड कॉल करें और अपने दोस्तों को भी करने के लिए कहे.यह श्री हजारे की लड़ाई नहीं है बल्कि हर उस नागरिक की लड़ाई है. जिसने भारत माता की धरती पर जन्म लिया है.पत्रकार-रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना हैं ज़ोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है